Salman Khan Hit and Run Case- (Some Untouced Points)
28 सितम्बर 2002 को लापरवाही से गाड़ी चलाने के आरोप में सलमान
खान को गिरफ्तार किया गया क्योंकि
उनकी तेज़ रफ्तार कार से सड़क की पगडण्डी पर सो
रहा एक व्यक्ति मारा गया और अन्य तीन घायल हो गए। सलमान पर
अभियोग चला और ट्रायल कोर्ट ने उन्हें दोषी मानते हुए सजा सुनाई। भारतीय न्याय
व्यवस्था के अन्तर्गत खान साहब के वकील ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय को हाईकोर्ट में
चुनौती दी और अन्ततः कुछ ही महीनों में हाईकोर्ट ने सलमान खान को निर्दोष घोषित कर
सभी दण्डों से मुक्त कर दिया। जब ट्रायल कोर्ट में निर्णय सलमान खान के विरूद्ध
आया तो उनके वकील ने हाईकोर्ट में उस निर्णय को चुनौती दी और कुछ महीनों तक चलें
अभियोग में हाईकोर्ट ने उनके मुवक्किल को रिहा कर दिया। अब महाराष्ट्र सरकार
हाईकोर्ट के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का मन बना रही हैं।
जब तक इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में अधिकारिक
चुनौति नहीं दी जाती तब तक हाईकोर्ट के निर्णय को ही मान्यता दी जानी चाहिये। हाईकोर्ट
द्वारा दिये गये निर्णय का एक अर्थ यह भी हुआ कि ट्रायल कोर्ट का निर्णय गलत था और
सलमान खान को सुनाई गई सज़ा न्यायसंगत नहीं थी और उन्हें न्याय के लिये हाईकोर्ट
जाना पड़ा जहाँ उन्हें न्याय मिला। सलमान खान की वार्षिक आमदनी सौ करोड़ से कई
अधिक हैं इसलिये उन्होंने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट में वर्षों तक चलें अभियोग में
वकील आदि का खर्च आसानी से उठा लिया। यदि भविष्य में उन्हें सुप्रीम कोर्ट भी जाना
पड़ा तो आर्थिक रूप से तो उन्हें कोई परेशानी नहीं होगी। एक स्वाभाविक प्रश्न
अवश्य बनता हैं कि क्या हमारे देश में इस हिट एण्ड रन के अलावा ऐसे और भी अभियोग
हैं, जिनमें ट्रायल कोर्ट ने अभियुक्त के विरूद्ध गलत निर्णय दिया हैं और उसे
हाईकोर्ट में ही न्याय मिल सकता हैं? क्या आम भारतीय नागरिक अपने विरूद्ध दिये गये निर्णय को हाईकोर्ट
अथवा सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर वर्षों तक अभियोग हेतु वकील आदि का शुल्क एवं
अन्य व्यय देने में समर्थ हैं? शायद, नहीं। अधिकाँशतः कुछ
हज़ार रूपये मासिक के वेतन पर जीवनयापन करने वाले आम भारतीय नागरिक लिये तो यह
सम्भव नहीं कि वह वर्षों तक अदालत के चक्कर लगा सकें। मेरा पूर्ण विनम्र आग्रह हैं देश
के न्यायधिशों एवं तमाम सत्तासीन प्रबुद्ध जनों एवं बुद्धिजीवियों से कि वह इस बात
पर विचार करें कि भारतीय न्यायव्यवस्था में किस प्रकार से परिवर्तन किये जाये ताकि
इस न्यायव्यवस्था के अन्तर्गत प्रत्येक भारतीय को उचित न्याय समय पर मिल सकें और
उसे दशकों तक अदालतों के चक्कर न काटने पड़े। अन्य विकसित देशों की तरह भारत के
न्यायालयों में भी जुरी प्रणाली लागु करने पर विचार किया जा सकता हैं जिसके
अन्तर्गत देश के नागरिक अपने-अपने क्षेत्र की न्यायालयों में जाकर अभियोगों पर
प्रमाणों के आधार पर कानून के अन्तर्गत निर्णय दे सकें। न्यायालय एवं न्यायाधिशों
की संख्या में भी वृद्धि की जा सकती हैं और ऐसे ही कई सम्भव विकल्प हैं जिन पर
हमारे मुख्य न्यायाधीश महोदय एवं सम्बन्धित मंत्री विचार कर सकते हैं।
एक अन्य प्रश्न यह भी उठता हैं कि सड़क किनारे
सो रहा जो व्यक्ति मारा गया, उसकी मृत्यु अथवा हत्या के लिये दोषी कौन हैं?
उसकी मौत के लिये सलमान खान अथवा उनकी गाड़ी को चलाने वाला कोई गैर ही अकेला दोषी
हैं, ऐसा कहना सही नहीं हैं। क्या उस क्षेत्र(जहाँ दुर्घटना हुई) के राजनेता (पार्षद,
विधायक और सांसद) और पुलिस अफसरों भी दोषी नहीं हैं? कोई
व्यक्ति सड़क पर सोने को विवश हो जाये तो यह जिम्मेदारी सरकार में बैठे मंत्रियों
की बनती हैं कि वह उस व्यक्ति के लिये सुरक्षित आवास का प्रबन्ध करें साथ ही उचित
रोजगार भी उपलब्ध करवायें ताकि भविष्य में आवास के लिये वह आत्मनिर्भर हो सकें और
उसे सड़क पर न सोना पड़े। यदि उस क्षेत्र के पार्षद और विधायक आदि ने अपनी
जिम्मेदारी निभाई होती तो क्या उस हादसे को टाला नहीं जा सकता था? यदि
इस दृष्टिकोण से न्यायाधीश महोदय द्वारा इस अभियोग पर पुनः विचार किया जाये तो इस
अभियोग का निर्णय ऐतिहासिक सिद्ध हो सकता हैं, साथ ही अन्य क्षेत्रों में भी ऐसी
घटनाएँ कम होंगी क्योंकि हम सही दोषियों को सजा देंगे। पाठकगणों द्वारा इस बात का
यह अर्थ न लिया जाये कि सलमान खान अथवा गाड़ी चलाने वाला व्यक्ति निर्दोष हैं
अपितु मुझे यह लगता हैं कि दोषी कोई एक नहीं कई लोग हैं। यदि उन प्रबुद्ध जनों पर
अभियोग न चलाया जा सकें तो कम से कम लोकतान्त्रिक व्यवस्था का सम्मान बनाये रखने
के उद्देश्य से आम नागरिकों के पक्ष से न्यायालय में इन नेताओं से प्रश्न अवश्य किये
जाये कि क्यों उन्होंने अपना कार्य ईमानदारी से नहीं किया? मंत्रियों
के पास अपने बचाव में कई दलीले होंगी परन्तु उनके द्वारा ईमानदारी से कार्य इसलिये
नहीं किया जाता क्योंकि उन्हें चुनाव जीत जाने के पश्चात् पाँच वर्षों तक किसी भी
प्रकार का भय नहीं रहता और वह दायित्व का निर्वाहन नहीं करते। इस समस्या का भी
एकमात्र समाधान हैं राईट टू रिकॉल अर्थात् भ्रष्ट नेता को पाँच साल की अवधि से
पूर्व नौकरी से निकालने का अधिकार। जब आम नागरिक के पास राईट टू रिकॉल नाम का
शस्त्र होगा तब यह सभी भ्रष्ट नेता ईमानदारी से काम करेंगे और जो काम नहीं करेगा
उसे नागरिक मंत्रीपद से बर्खास्त कर देंगे और इस कानून के पारित होने के पश्चात् ईमानदार
अफसर आदि भी अपना काम निड़र होकर कर सकेंगे क्योंकि उन्हें अपने स्थानान्तरण का भय
नहीं रहेगा। वर्तमान भारतीय व्यवस्था में नासूर बन चुका भ्रष्टाचार खत्म करने के
लिये राईट टू रिकॉल से बेहतर विकल्प नहीं हैं।
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योगेश गज्जा ‘दीक्षित’


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