भगवान शिव द्वारा रुद्राक्ष का महात्मय वर्णन

शिवजी द्वारा रुद्राक्ष का महिमागान


       एक समय माता पार्वती द्वारा प्रश्न करने पर लोकोपकार हेतु भगवा
न शिव ने रुद्राक्ष का प्रादुर्भाव एवं उसके महात्मय का वर्णन माँ के समक्ष किया।
       भगवान शिव ने कहा - महेश्वरि शिवे! मैं तुम्हारे प्रेमवश भक्तों के हित की कामना से रुद्राक्ष की महिमा का वर्णन करता हूँ, सुनो । महेशानि! पूर्वकाल की बात है, मैं मन को संयम में रखकर हज़ारों दिव्य वर्षों तक घोर तपस्या में लगा रहा । एक दिन सहसा मेरा मन क्षुब्ध हो उठा । अतः उस समय मैने लीलावश ही अपने दोनों नेत्र खोले, खोलते ही मेरे मनोहर नेत्रपुटों से कुछ जल की बूँदें गिरीं । आँसू की उन बूँदों से वहाँ रुद्राक्ष नामक वृक्ष पैदा हो गया । भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये वे अश्रुबिन्दु स्थावर भाव को प्राप्त हो गये । वे रुद्राक्ष मैंने विष्णुभक्त और चारों वर्णों के लोगों को बाँट दिये ।
       इसके पश्चात् भगवान शिव रुद्राक्ष की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं –
       भगवान कहते हैं - वह उत्तम रुद्राक्ष असह्य पापसमूहों का भेदन करने वाले तथा श्रुतियों के भी प्रेरक हैं । भोग और मोक्ष की इच्छा रखने वाले चारों वर्णों के लोगों को और विशेषतः शिवभक्तों को शिव-पार्वती की प्रसन्नता के लिये रुद्राक्ष के फलों को अपने-अपने वर्णानुसार अवश्य (शास्त्रोंक्त विधि से) धारण करना चाहिये । पापों का नाश करने के लिये रुद्राक्ष धारण आवश्यक बताया गया है । वह निश्चय ही सम्पूर्ण अभीष्ट मनोरथों का साधक है । अतः अवश्य ही उसे धारण करना चाहिये । 
देवि! समान आकार वाले, चिकने, मजबूत, स्थूल, कण्टकयुक्त (उभरे हुए छोटे दानों वाला) और सुन्दर रुद्राक्ष अभिलषित पदार्थों के दाता तथा सदैव भोग और मोक्ष देने वाला हैं । किन्तु, जिसे कीड़ों ने दुषित कर दिया हो, जो टूटा-फूटा हो, जो कण्टकयुक्त न हो, जो व्रणयुक्त हो और पूरा-पूरा गोल न हो, उन रुद्राक्षों का त्याग कर देना चाहिये । रुद्राक्ष की माला धारण करने वाले पुरुष को देखकर भूत, प्रेत, पिशाच, डाकिनी, शाकिनी तथा जो अन्य द्रोहकारी राक्षस आदि हैं, वह सब-के-सब दूर भाग जाते हैं । पार्वती! रुद्राक्षधारी को देखकर मैं (शिव), विष्णुदेवी दुर्गागणेशसूर्य तथा अन्य देवता भी प्रसन्न हो जाते हैं। महेश्वरी! इस प्रकार रुद्राक्ष की महिमा जानकर धर्म की वृद्धि के लिये भक्तिपूर्वक शास्त्रोंक्त मन्त्रों द्वारा विधिवत् उसे (रुद्राक्ष को) धारण करना चाहिये ।


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       नोट :- श्री शिवमहापुराण की विद्येश्वरसंहिता के इस 25वें अध्याय में भगवान शिव नें एक बात स्पष्ट कहीं है जिस पर ध्यान देना हमारे लिये अत्याधिक आवश्यक हैं । भगवान शिव कहते है कि “रुद्राक्षधारी पुरुष अपने खान-पान में मदिरामांसप्याज-लहसुन, सहिजन, लिसोड़ा आदि को त्याग दे।” केवल शास्त्रविधि से ही रुद्राक्ष धारण करना कल्याणकारी हैं न कि अपनी मनचाही रीती से ।
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शिवाय_नमः

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