जे एन यू के आरोपियों के साथ-साथ समर्थकों पर भी हो कार्यवाही......

जब भारतीय सेना के वीर जवान लांसनायक हनुमंथप्पा दिल्ली के आर्मी अस्पताल में शहीद हुए तो सम्पूर्ण राष्ट्र में शोक की लहर दौड़ गई। देश के देशभक्त नागरिकों ने विभिन्न माध्यमों से उस वीर सैनिक को श्रद्धांजलि अर्पित की, जिनमें सोशियल मीडिया पर मुख्य रूप से हैश टैग चलाये गए। वैसे तो चिकित्सकों द्वारा लांसनायक की मृत्यु के कारण स्पष्ट किये गए परन्तु हनुमंथप्पा की मृत्यु से जुड़े एक कारण को सोशियल मीडिया में काफी प्रसारित किया गया, जिसमें कहा गया कि जिस दिल्ली में अफजल के समर्थन में नारे लग रहे हो उस दिल्ली की हवा में हनुमंथप्पा ने साँस लेने से इंकार कर दिया। यह विचार किसके विचारों की उपज है यह तो मैं नहीं जानता परन्तु इस पंक्ति ने विचार और चिंतन हेतु विवश कर दिया कि क्या सच में दिल्ली में देशभक्तों का रहना मुश्किल हो गया हैं? सम्भवतः यह पंक्तियाँ दार्शनिक प्रतीत हो परन्तु यह भी सत्य है कि जिस प्रकार के राष्ट्रविरोधी नारे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में लगाये गए उसके बाद किसी भी राष्ट्रभक्त के लिये दिल्ली में सांस लेना आसान नहीं होगा।
लांसनायक हनुमनथप्पा

इन दिनों किसी भी देशभक्त के लिये यह असहनीय हो गया है कि देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में राष्ट्रविरोधी नारे लगाने वाले तथाकथित विद्यार्थियों के विरूद्ध जब पुलिस एवं केन्द्र सरकार कार्यवाही कर रही है तो देश के कई बुद्धिजीवी और राजनीतिज्ञ उन देशद्रोहियों का समर्थन कर रहे हैं। आम आदमी पार्टी के अरविन्द केजरीवाल, राहुल गाँधी, सिताराम यैचुरी जैसे नेता अपना राजनीतिज्ञ हित साधने के लिये उन राष्ट्रविरोधी नारों  को युवाओं की आवाज़ बता रहे हैं और पुलिस द्वारा की गई कार्यवाही को गलत बता रहे हैं। क्या इन लोगो के लिये राजनीति राष्ट्र से अधिक प्रिय हो चुकि है। जेएनयु के जिन छात्रों को दिल्ली के आम नागरिकों ने अपने घर किराये पर देने तक से इंकार कर दिया सिर्फ यह जानकर कि उनमें से कुछ उस दिन राष्ट्रविरोधी नारे लगाने वालो में सम्मिलित थे, ऐसे में राज्य के मुख्यमंत्री से अधिक विवेक एवं राष्ट्रीय भावना की आशा की जाती हैं परन्तु मुख्यमंत्री केजरीवाल ने ऐसे में अपनी राजनीति को चमकाना अधिक महत्वपूर्ण समझा। ज्ञात रहें कि इन्हीं केजरीवाल साहब से जब पठानकोठ हमले पर प्रश्न किये गए तो उन्होंने यह कहकर उत्तर देने से इंकार कर दिया कि यह मुद्दा दिल्ली का नहीं हैं, परन्तु उसके कुछ समय बाद वह हैदराबाद में एक दलित छात्र रोहित वेमुला के समर्थकों से मिलने पहुँचे तो अब जेएनयु के राष्ट्रविरोधी नारे लगाने वालों पर हुई कार्यवाही पर भी उन्हें केन्द्र सरकार और पुलिस ही गलत नजर आ रहे हैं। इसी कड़ी में कम्यूनिष्ट पार्टी के नेता सीताराम येचुरी ने तो यहाँ तक कह दिया कि दिल्ली में पुलिस द्वारा की गई कार्यवाही इमरजेंसी के जैसी हैं। जितना मैने पढ़ा है उसके अनुसार तो इमरजेंसी में उन लोगो को जेल में डाला जा रहा था जो लोकनायक जयप्रकाश नारायण के साथ राष्ट्रहित में आवाज बुलन्द कर रहे थे, परन्तु दिल्ली में उन लोगो को जेल में  डाला गया जिन्होंने राष्ट्र की राजधानी में राष्ट्र के विरूद्ध नारे लगाये। सभी मोर्चों पर विफल हो चुकि काँग्रेस के मुख्या राहुल गाँधीजी भी यह मानते है कि सरकार द्वारा विद्यार्थियों की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को कुचला जा रहा हैं, उन्हें वह लोग निर्दोष लगते है जो भारत को आतंकी अफजल का न्यायिक हत्यारा कहते हैं और जो भारत के टुकड़े करने की बात करते हैं। इन राजनीतिक संगठन के मुख्याओं का इन राष्ट्रविरोधी तत्वों का समर्थन करने के पीछे क्या उद्देश्य हो सकता हैं? कुछ महिनों बाद उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में सभी राजनीतिक संगठन अपनी-अपनी तैयारियों में जुटे हुए हैं और ऐसे में एक समुदाय विशेष और छात्रों को वोट बैंक की तरह प्रयोग करने की मंशा तो अधिकाँश राजनीतिक दल पाले हुए हैं। कुछ आँकड़ो और रिपोर्ट्स की माने तो बिहार और दिल्ली में हुई हार के बाद भी देशभर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता में गिरावट नजर नहीं आ रही। यहीं बात आम आदमी पार्टी और विभिन्न राजनीतिक दलों को डरा रही और परिणामस्वरूप वह देश में होने वाली हर छोटी-बड़ी घटना का दोष किसी न किसी रूप में केन्द्र सरकार और नरेन्द्र मोदी को दे रहे हैं। इस तरह वह उन्हें बदनाम करने और वोट बैंक बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं, यह स्पष्ट हैं। दुख तो इस बात है कि वोट बैंक की राजनीति में देश में नागरिकों द्वारा दिये जा रहे टैक्स पर पढ़ने वाले देशद्रोहियों का समर्थन किया जा रहा हैं। सिर्फ राजनीतिक संगठन ही नहीं अपितु कुछ दिन पूर्व दिल्ली के प्रेस क्लब में कश्मीर के मुद्दे पर चर्चा करने के नाम पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसके मंच पर लगी एक तस्वीर में आतंकी अफजल को एक हिरो बताया गया और मंच के सामने देश विरोधी नारे लगाये जा रहे थे। अफजल के समर्थकों का समर्थन स्वयं अफजल का समर्थन करना ही हैं और अफजल का समर्थन करने का अर्थ है देश के उन तमाम शहीदों का अपमान करना जिन्होंने समय समय पर देश की रक्षा में अपने प्राणों को न्यौछावर किया हैं।
जेएनयू में हुई इस घटना के पश्चात् जब मीडिया द्वारा सरकार और पुलिस पर दबाव बनाया गया तो पुलिस हरकत में आई और जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को गिरफ्तार किया गया। कन्हैया की गिरफ्तारी के बाद से ही इन नेताओं ने उसके समर्थन में विभिन्न कुतर्क करने आरम्भ कर दिये और पुलिस भी अपनी कार्यवाही को अधिक विस्तार न दे सकी। परिणाम स्वरूप जेएनयू में राष्ट्र विरोधी नारे लगाने वाले दर्जनों तथाकथित विद्यार्थियों में से मात्र एक को गिरफ्तार किया गया हैं, वह उमर खालिद भी अब तक आजाद है जो विभिन्न न्यूज़ चैनल पर जाकर अफजल के समर्थन को उचित बता रहा था और राष्ट्रविरोधी नारों को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का नाम दे रहा था। यद्यपि, किसी भी राजनीतिक दल द्वारा वोट बैंक के लिये किये जा रहे इन प्रयासों को देश का साक्षर मतदाता समझ सकता हैं और निःसन्देह राष्ट्रविरोधियों का समर्थन करने का खामियाज़ा यह दल चुनाव के समय भुगतेंगे। परन्तु, आज यदि इन लोगो के विरूद्ध किसी प्रकार की कार्यवाही न की गई तो चुनाव तक हमारे देश को इन स्वार्थी राजनीतिज्ञों के कारण गम्भीर नुकसान उठाने पड़ सकते हैं। आज देश में राष्ट्रविरोधी तत्वों के विरूद्ध सख्त कानून बनाने और दोषियों को उचित सजा देने के लिये सख्त व्यवस्थाओं को अपनाने की आवश्यकता हैं। यदि आज इन देशद्रोहियों को रोका न गया तो जो राष्ट्रविरोधी नारों की जो गूँज पाकिस्तान से उठकर कश्मीर के रास्ते दिल्ली के जेएनयू तक पहुँच गई हैं, वह कल देश के विभिन्न शिक्षण संस्थाओं तक पहुँच सकती हैं और देश के कई हिस्सों से इस तरह के देशद्रोही सर्प फन फैला सकते है।

-         योगेश गज्जा दीक्षित

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