धर्मान्तरण - क्यों और कैसे ?
आज से कुछ दिन पूर्व सोशियल_मीडिया पर एक सूचना प्रसारित हो रही थी कि देश के किसी ग्रामिण क्षेत्र के कुछ सैकड़ों हिन्दुओं ने अपना धर्मान्तरण कर इस्लाम स्वीकार कर लिया हैं। इससे पूर्व में एक वीडियों को भी प्रसारित किया गया कि हरिद्वार में एक पादरी खुले आम हिन्दुओं को इसाई बना रहा था। निःसन्देह हिन्दुत्व प्रेमी और तथाकथित हिन्दु रक्षक संगठनों के नेताओं और कार्यकर्ताओं द्वारा इन तस्वीरों और वीडियों को वाइरल किया गया। इस तरह उनका प्रयास था कि देश के हिन्दुओं को इस बात का एहसास कराया जाये कि कुछ मिशनरी और मदरसे आदि देश के हिन्दुओं का निरन्तर धर्मान्तरण कर रहे हैं। इस प्रकार की सूचनाओं को पढ़कर प्रतीत हुआ कि अधिकाँश नागरिक इस धर्मान्तरण के लिये सिर्फ मिशनरी और मदरसों को दोष देते हैं और इस बात पर किसी प्रकार की चर्चा नहीं होती कि आखिर कोई बाहरी संस्था अथवा व्यक्ति विशेष हजारों हिन्दुओं का धर्मान्तरण करने में किस प्रकार सफल हुआ? ऐसा_क्यों?
इस समस्या के सम्बन्ध में जितना अध्ययन मैने किया हैं, उसके अनुसार देशभर में जिन हिन्दुओं का धर्मान्तरण हो रहा हैं उनमें एक बड़ा भाग उन हिन्दुओं का हैं, जिन्हें समाज के तथाकथित उच्च जातिवालों ने दलित अथवा अछूत कहकर समाज में पिछड़ी जाति का दर्जा दिया हैं साथ ही उनसे उनके मौलिक अधिकार छीनकर उनका शोषण कर रहें हैं। साथ ही वह लोग भी तेजी से धर्मान्तरण कर रहे हैं जिनके लिये सनातन धर्म के नियम अथवा हिन्दू मैरिज एक्ट भोग में बाधा बनता हैं, अभिनेता धर्मेन्द्र आदि इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं जिन्होंने एक पत्नि होते हुए भी दूसरी शादी करने के लिये अपना धर्म परिवर्तन कर इस्लाम अपना लिया। दूसरी प्रकार के जीवों का कोई इलाज नहीं हैं, मेरे विचार से तो ऐसे लोगो का सनातन धर्म से दूर रहना ही बेहतर हैं। अब बात करें देश के गरीब और दलित हिन्दुओं की तो उनके धर्मान्तरण के लिये मुख्यतः दो कारण हैं- देश की खराब राजनीतिक व्यवस्था और उन लोगों तक सनातन धर्म का ज्ञान न पहुँचना। असल में देश के ग्रामिण क्षेत्रों में एक ओर दलित आदि पिछड़ी जातियाँ गरीबी का शिकार होती हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ अहंकारी तथाकथित ऊँची जाति वालों द्वारा उनका सामाजिक बहिष्कार और शोषण किया जाता हैं। ऐसे में विदेशी धन की सहायता से एक मिशनरी अथवा मदरसा आदि संस्था उन दलितों तक रोटी, कपड़ा, मकान, चिकित्सा और शिक्षा जैसी मूल सुविधाएँ बेहद कम दरो पर अथवा मुफ्त में पहुँचाती हैं। इस सहायता की आड़ में इन लोगों द्वारा परोक्ष रूप से अपने धर्म का प्रचार भी किया जाता हैं। ऐसे में जब एक परिवार को सभी मूल सुविधाएँ और सम्मान जिन लोगो से मिलता हैं वह उनके प्रति सहानुभूति के कारण उनका धर्म अपना लेता हैं। इस समस्या का एकमात्र समाधान हैं देश में व्यवस्था_परिवर्तन।
एक बात जो विशेष रूप से कहना चाहता हूँ कि आज हमारे देश में कई संगठन हैं जो स्वयं को हिन्दु और हिन्दुत्व का रक्षक कहते हैं, परन्तु क्या सच में कोई संगठन हिन्दुत्व की रक्षा करता हैं? अधिकाँशतः तो यह ही देखने को मिलता हैं कि यह संगठन अथवा इनके नेता धर्मान्तरण के विरूद्ध केवल विवादित बयान देने का कार्य करते हैं और कुछ नहीं। खैर! इन संगठनों से देश अथवा धर्म की रक्षा की उम्मीद करना बेइमानी ही हैं। पोस्ट को अधिक लम्बा न करते हुए बस इतना लिखकर खत्म करना चाहता हूँ कि कोई हिन्दु यदि धर्मान्तरण करता है तो इसका अर्थ हैं कि वह भौतिक सुविधाओँ की लालसा में सनातन परम्परा से दूर हुआ हैं। ऐसा तब होता हैं जब एक हिन्दु परिवार के व्यक्ति को बचपन से यह तो सिखाया जाये कि वह हिन्दु हैं, परन्तु उसे यह न बताया गया हो कि हिन्दु अथवा सनातन परम्परा हैं क्या? यदि समय रहते किसी हिन्दु को सनातन धर्म से परिचित करवा दिया जाये तो कोई भी अन्य धर्मावलम्बी उन्हें धर्मान्तरण के लिये प्रेरित नहीं कर सकता। यदि ऐसा होता हैं तो उचित हैं अन्यथा भारत एक लोकतन्त्र जहाँ सभी को अपने धार्मिक विचारों का प्रचार करने का उनके अनुसार आचरण करने की स्वतन्त्रता हैं।
वन्दें मातरम्.....
- योगेश गज्जा 'दीक्षित'



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