INTERNATIONAL COSPIRACY BEHIND WOMEN EMPOWERMENT | महिला सशक्तिकरण और महिला स्वावलम्बन के नाम से किया जा रहा षड्यन्त्र
महिला सशक्तिकरण और महिला स्वावलम्बन - ''एक षड्यन्त्र''
मित्रों! ऐसा लगता है कि पिछले कुछ समय से हमारे भारत में महिला सशक्तिकरण के नाम पर कुछ तथाकथित समाजसेवकों, समाजसेवी संस्थाओं एवं अभिनय जगत के लोगो द्वारा भारतीय सनातन संस्कृति को जड़मूल से समाप्त करने का प्रयास किया जा रहा हैं। उन लोगो के इस प्रयास में भारतीय मीडिया एवं फिल्म जगत द्वारा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जा रही हैं।
इसी कड़ी में अभिनय जगत के निर्देशक महेश भट्ट द्वारा स्टार प्लस पर "नामकरण" नाम का एक नया कार्यक्रम आरम्भ किया जा रहा हैं। अब तक कार्यक्रम की कुछ झलकियों का प्रसारण किया गया हैं जिनकों देख के ऐसा लगता है कि इसमें भी उन्हीं विषयों पर प्रकाश डालने का नाटक किया जायेगा जिन पर कुछ तथाकथित समाज सेवी कार्य कर रहे हैं। इसकी पहली झलक में एक बच्ची द्वारा कुछ महिलाओं से प्रश्न किया जाता हैं कि "शादी से पहले पिता का नाम और शादी के बाद पति का नाम तो एक औरत का अपना नाम कहाँ जाता हैं?" जहाँ तक मैं समझता हूँ, ऐसा तो नहीं होता कि किसी भी महिला का अपना नाम पिता और पति के नाम के बीच घुम हो जाता हैं। आश्चर्य होता है देखकर कि हमारे भारत में ऐसे धारावाहिक का प्रसारण तब किया जा रहा हैं, जब पी.वी सिन्धु और साक्षी मलिक जैसी बेटियाँ ऑलम्पिक में अपना और देश का नाम रोशन करके लौटी हैं। इतिहास में भी रानी लक्ष्मीबाई, दुर्गादेवी वोहरा जैसी कई नारियाँ थी जिन्होंने घर से निकलकर राष्ट्रहित में अपना योगदान दिया। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की सेना में महिलाओं की अलग टुकड़ी थी। भारत के इतिहास से लेकर वर्तमान तक ऐसे अनेको नाम लिये जा सकते हैं जब विवाहिताओं ने राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त की हैं। महिला सशक्तिकरण के नाम पर देश की महिलाओं की विचारधारा का पश्चिमीकरण करना सर्वथा अनुचित हैं और यह हमें समझना चाहिये। क्या पिता का घर बेटी का भी घर नहीं होता अथवा पति का घर पत्नि का अपना घर नहीं होता? मेरे घर में भी एक छोटी बहन हैं और मैने न तो घर में और न किसी अन्य परिवार में कभी देखा कि किसी पिता ने अपनी बेटी को पराया समझा हो। हाँ, कुछ हँसी-मज़ाक तो होते ही हैं और किसी भी पिता के मन में बेटी के विवाह के सम्बन्ध में चिंता और उत्सुकता तो होती ही हैं। साथ ही मैने कभी किसी पुरूष को नहीं देखा जिसने अपनी पत्नी को पराया समझा हो। वर्तमान में तो हालात यह है कि अपनी बेटियों के लिये पिता हँसी-खुशी अपनी जीवन भर की पूँजी और सर्वस्व न्यौछावर कर देते हैं और पति तो विवाह के दूसरे ही दिन माँ-बाप से अधिक हुकुम पत्नि के मानने लगता हैं। कई परिवारों के बुजुर्ग तो इसलिये ही वृद्धाश्रमों में बैठे है क्योंकि उनके बेटों में उनसे ज्यादा अपनी पत्नि के आदेश की पालन करना आरम्भ कर दिया हैं। आप स्वयं विचार कीजिये कि क्या ऐसे में किसी महिला का नाम घुम हो सकता हैं?
हाँ, इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि कुछ पिछड़े इलाकों में महिलाओं के साथ समाज का व्यवहार ठीक नहीं हैं परन्तु उस समस्या का एकमात्र समाधान हैं, उचित शिक्षा। परन्तु, 'नामकरण' जैसे धारावाहिक का प्रसारण करना सही नहीं हैं। इस तरह तो हमारी उन बहनों की विचारधारा विकृत होगी जो भविष्य में किसी परिवार में विवाह करके पहुँचेंगी। नवयुवती बहनों के विचारों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की पूर्ण सम्भावना हैं। जिस भारत में माता-पिता की शिक्षा के परिणामस्वरूप युवतियाँ ससुराल में अपने पति, सास-ससुर, बच्चों के लिये जीती थी आज इन्हीं धारावाहिकों के दुष्प्रभाव के कारण उन्हें ससुराल की जिम्मेदारियाँ बंधन अथवा गुलामी लगने लगेंगी और अन्ततः या तो वह अपने पति को लेकर अलग होंगी अथवा पति से ही अलग हो जायेगी अर्थात् तलाक ले लेंगी। आँख चुराने से कोई फायदा नहीं होगा। यह समस्या हमारे समाज में आरम्भ हो चुकि हैं और निरन्तर बढ़ रही हैं। परिवार अथवा राष्ट्र की आवश्यकता होने पर हमारे देश में माताओं-बहनों ने घरों से निकलकर ख्याति भी प्राप्त की हैं। रानी लक्ष्मी बाई, इंदिरा गाँधी, पीवी सिन्धु, सानिया मिर्ज़ा जैसे लाखों उदाहरण हैं। हमें आवश्यकता हैं परिवार व्यवस्था को भारतीयता के आधार पर चलाने की, न की किसी विदेशी चन्दे पर पल रहे समाजसेवी के विचारों के आधार पर।
विचार करें....
योगेश गज्जा 'अल्पज्ञ'



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