KARPATRIJI MAHARAJ REAL STORY | सन्त सान्निध्य से भी क्यों नहीं होती आध्यात्मिक उन्नति?

यथार्थ उद्देश्य-निर्धारण से ही सफलता


अक्सर जब किसी सन्त के दर्शन का सुअवसर प्राप्त होता है, तो मन फूला नहीं समाता। सन्तों के चरणों में मस्तक रखकर ऐसा प्रतीत होता है मानों जीवनभर का भार एक क्षण में सर से उतर गया और मस्तिष्क हल्का हो गया। दिल भर आता है, ऐसा लगता है मानों आँखों से अश्रुधारा निकल पड़ेगी। किन्तु ऐसा सिर्फ शास्त्रीय कथन का अनुसरण करने वाले सन्तों के दर्शन पर ही होता, अन्य के साथ नहीं। वैसे भी जो शास्त्रीय आदेशों की पालना न करें वह सन्त हो ही नहीं सकता। खैर, जब किसी सन्त के दर्शन के लिये जाता हूँ तो देखता हूँ कि उनके भक्तों की बड़ी भारी भीड़ रहती है और हर कोई उन सन्त के सम्बन्ध में ही चर्चा कर रहा होता है। उन चर्चाओं में अक्सर चमत्कार की बातें होती है किन्तु सन्त द्वारा प्रदत्त आध्यात्मिक ज्ञान अथवा आध्यात्मिक उन्नत्ति की नहीं। ऐसे में अक्सर एक प्रश्न मन में उठता है कि आखिर उन लोगों का आध्यात्मिक कल्यान क्यों नहीं होता जो उन सन्त के साथ वर्षों से भ्रमण, दर्शन आदि कर रहें है। क्यों आज भी वह भक्त मात्र भौतिक उन्नति में ही संलग्नित है। ऐसा क्यों? सच कहूँ तो यह प्रश्न परेशान करता था किन्तु कभी किसी साधू-सन्त आदि से यह प्रश्न करने का साहस नहीं हुआ। अन्ततः कुछ दिन पूर्व धर्मसम्राट स्वामी श्री करपात्रीजी महाराज की जीवनी पढ़ने का अवसर मिला जो माननीय श्री राधेश्याम खेमका द्वारा लिखित है। इस पुस्तक के ही एक अध्याय में स्वामीजी ने बताया है कि आखिर क्यों कुछ भक्तों का सन्तों के सान्निध्य में रहकर भी आध्यात्मिक विकास नहीं हो पाता। यह प्रसङ्ग हम सनातन धर्मियों को अवश्य पढ़ना चाहिये और उस पर चिन्तन करते हुए उस कथा के सार को अपने जीवन में आत्मसात करने का प्रयास करना चाहिये। तो कथा कुछ ऐसी है कि एक बार एक भक्त ने स्वामी श्री करपात्रीजी महाराज से प्रश्न किया कि -
संत की संनिधि प्राप्त हो जाने पर जीवन में परिवर्तन होना चाहिये, परन्तु लोक में इसके विपरीत बात दिखाई पड़ती है । वर्षों तक संत की संनिधि और संनिधि और सेवा से भी आंतरिक वासनाएँ और आन्तरिक दुर्गुण समाप्त नहीं होते। इसका उन्होंने एक उदाहरण भी प्रस्तुत किया ।
तब महाराज जी ने उत्तर में एक कथा सुनायी ।

"एक राजा और रानी थे। एक दिन अकस्मात राजा का देहान्त हो गया। राज्यभर में शोक की लहर छा गई, रानी परम पतिव्रता सती-साध्वी और तत्त्वज्ञान से युक्त थी। राजा की अंत्येष्टि के लिये चन्दन की चिता लगायी गयी, जिस पर रानी अपनी गोद में राजा को लेकर बैठ गई। राज्य की सम्पूर्ण शोकाकुल प्रजा राजा की देखने उमड़ पड़ी। उसी क्षण चिता पर बैठी रानी ने अपनी प्रजा को सान्त्वना देने के लिये एक सुन्दर व्याख्यान दिया, जिसमें ब्रह्म के यथार्थ-स्वरूप का निरूपण करते हुए आत्मा अजर-अमर-नित्य और शाश्वत है तथा मन-बुद्धि-अहंकार-संयुक्त यह शरीर अनित्य और नश्वर है। अतः इसके लिये कभी शोक करना उचित नहीं। इस जनसमुदाय में रानी के गुरूजी भी उपस्थित थे। यह सब सुनकर उन्हें अत्यधिक आश्चर्य हो रहा था। दो मिनट की एकान्त वार्ता में उन्होंने रानी से कहा कि - 'तू मेरी शिष्या है, मैने ही तुझे पढ़ाया है। परन्तु तुम्हारी इतनी ऊँची स्थिति कैसे बन गयी, जबकि मेरे मन में तो कोई परिवर्तन हुआ ही नहीं।' तब रानी ने उत्तर दिया - 'यह तो ठीक है कि मैं शिष्या आपकी ही हूँ। परन्तु मुझे शिष्या बनाने और पढ़ाने में आपका लक्ष्य क्या था?' तब गुरूजी ने कहा कि 'मेरा उद्देश्य तो भौतिक सुख-समृद्धि और धन अर्जन करना ही था।' रानी ने पूछा कि 'आपका यह उद्देश्य पूर्ण हुआ कि नहीं?' गुरूजी ने उत्तर दिया कि 'मेरा तो उद्देश्य पूर्ण हो गया।' इस पर रानी ने कहा कि आपका उद्देश्य भौतिक समृद्धि और अर्थोपार्जन था और मेरा लक्ष्य आध्यात्मिक उन्नति और भगवद्प्राप्ति था। अतः आपको अपने लक्ष्य के अनुसार और मुझे मेरे लक्ष्य के अनुसार सफलता प्राप्त हुई।"
इस प्रकार महाराजश्री करपात्रीजी ने दृष्टांत देकर बताया कि उद्देश्य के अनुसार ही फल की प्राप्ति होती है। इसलिये यदि कोई उत्कृष्ट कार्य भी निकृष्ट उद्देश्य से किया जाय तो उसका परिणाम भी उत्कृष्ट नहीं हो सकता।
इसलिये कोई व्यक्ति संत-महात्माओं और गुरूजनो की सेवा अपने भौतिक स्वार्थ की पूर्ति के उद्देश्य से करता है तो स्वार्थपूर्ति हो जाती है, परंतु महात्मा की संनिकटता का लाभ जो मिलना चाहिये वह उसे नहीं मिल पाता।"
विचार करें.....
शिवाय नमः

- योगेश 'शाण्डिल्य' गज्जा

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