IMPORTANCE OF SHIV BHAKTI | मानव देह में शिवभक्ति का महत्व । shivpuran

भगवान शिव द्वारा भक्ति का वर्णन एवं विवेचन


       एक समय देवी सती ने एकान्त में भगवान शिव को भक्तिपूर्वक प्रणाम किया और भक्तिभाव से भगवान की स्तुति कर उनसे (भगवान शिव से) लोक हित के उद्देश्य से प्रश्न किया-
       देवि सती ने कहा - देवदेव महादेव! करुणासागर! प्रभो! दीनोद्धारपरायण! महायोगिन्! मुझ पर कृपा कीजिये । आप परम पुरुष हैं । परमेश्वर हर! मैं उस परम तत्व का ज्ञान प्राप्त करना चाहती हूँ, जो निरतिशय सुख प्रदान करने वाला है तथा जिसके द्वारा जीव संसार-दुःख से अनायास ही उद्धार पा सकता है । नाथ! जिस कर्म का अनुष्ठान करके विषयी जीव भी परम पद को प्राप्त कर ले और संसार बन्धन में न बँधे, उसे आप बताइये, मुझ पर कृपा कीजिये ।
       माँ भगवती द्वारा भक्तिभाव से जीवोद्धार के लिये किये गए उपरोक्त प्रश्न के उत्तर में भगवान शिव कहते है-
    भगवान शिव ने कहा - देवि! दक्षनन्दिनि! मैं उसी परमतत्व का वर्णन करता हूँ जिससे वासनाबद्ध जीव तत्काल मुक्त हो सकता है । परमेश्वरी! तुम विज्ञान को परमतत्व जानो । विज्ञान वह है, जिसके उदय होने पर 'मैं ब्रह्म हूँ' (अहं ब्रह्मास्मि) ऐसा दृढ़ निश्चय हो जाता है, ब्रह्म के सिवा दूसरी किसी वस्तु का स्मरण नहीं रहता तथा उस विज्ञानी पुरुष की बुद्धि सर्वथा शुद्ध हो जाती है । प्रिये! वह विज्ञान दुर्लभ है । इस त्रिलोकी में उसका ज्ञाता कोई विरला ही होता है । वह जो हैं, वह मेरा स्वरूप ही है, साक्षात्परात्पर ब्रह्म है । उस विज्ञान की माता है मेरी भक्ति, जो भोग और मोक्ष प्रदान करने वाली है । वह मेरी कृपा से सुलभ होती है । सती! भक्ति और ज्ञान में कोई भेद नहीं है । भक्त और ज्ञानी दोनों को सदा ही सुख प्राप्त होता है । जो भक्ति का विरोधी है, उसे ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती । देवि! मैं सदा भक्तों के अधीन रहता हूँ और भक्ति के प्रभाव से जातिहीन नीच मनुष्यों के घरों में भी चला जाता हूँ, इसमें संशय नहीं है ।
       इसके बाद भगवान ने सगुणा और निर्गुणा भक्ति का वर्णन किया।
       भगवान कहते है कि- सती! वह भक्ति दो प्रकार की होती है- सगुणा और निर्गुणा । जो वैधी (शास्त्रविधि से प्रेरित) और स्वाभाविकी (हृदय के सहज अनुराग से प्रेरित) भक्ति होती है, वह श्रेष्ठ है तथा इससे भिन्न जो कामनामूलक भक्ति होती है, वह निम्नकोटि की मानी गई है । पूर्वोक्त सगुणा और निर्गुणा - ये दो प्रकार की भक्तियाँ नैष्ठिकी और अनैष्ठिकी के भेद से दो भेदों वाली होती हैं । नैष्ठिकी भक्ति छः प्रकार की जाननी चाहिये और अनैष्ठिकी एक ही प्रकार की कही गयी है । विद्वान् पुरुष विहिता और अविहिता आदि  भेद से अनेक प्रकार की मानते है । 
        “देवि! मैं अपने भक्तों का रक्षक हूँ । सती! बहुत कहने से क्या लाभ, मैं सदा भक्त के अधीन रहता हूँ और भक्ति करने वाले पुरुष के अत्यन्त वश में हो जाता हूँ ।


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शिवाय_नमः

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