शिव और कृष्ण में भेदबुद्धि नरक कारक | Shiv and Krishna are ETERNAL & ONE |
आधुनिक छद्म वैष्णवों का भ्रमोच्छेदन
श्रीअर्जुन भी वैष्णव थे , ( श्री कृष्ण स्वयं कहते हैं गीता में भक्तोsसि मे सखा चेति ) पर महाभारत उठा कर देखिये कि ईश्वरीय रूप में कितनी शिव भक्ति की , कितनी देवी आदि की स्तुति की !
और आप इसी तरह के अनेक प्राचीन वैष्णवों के वक्तव्यों को पढिये, विष्णु से इतर भगवद्रूपों को विष्णु का सेवक ही कहा जाये , न कि स्वतन्त्र परमेश्वर , उनके वचनों में कहीं भी ये सैद्धान्तिक बाध्यता नहीं रही !
वैष्णवानां यथा शम्भुः ही नहीं वरन् शैवानां च तथा हरिः भी उनके वक्तव्यों में देदीप्यमान है ।
यह कलियुग से ही चल रहा है नवीन वैष्णववाद , जिसमें विष्णु के अतिरिक्त अन्य भगवदावतार सब अनीश्वर , केवल विष्णु ईश्वर ! भावराज्य में तो कदाचित् निजप्रभुमय देखहिं जगत् चल भी जाता है किन्तु सिद्धान्त में और व्यक्तिगत भावना में यदि अन्तर न रहे तो नृपनाशितपुत्रन्याय चरितार्थ हो जाता है । मेरे पति ही जगन्नाथ - एक पतिव्रता का भाव नमन करने योग्य वहीं तक है, जब तक वह इसे सर्वतन्त्र सिद्धान्त का रूप न देकर अपनी व्यक्तिगत भावना तक ही सीमित रखती है । अन्यथा, संसार की समस्त स्त्रियों का पति भी स्वयं के ही पति का ही होना घोषित करने लगेगी तो सैद्धान्तिक उत्पात सिद्ध होगा कि नहीं ?
इन कथित नवीन वैष्णवों ने स्वाभिमान को भक्ति का नाम देकर साकार ईश्वर को इतना संकुचित कर दिया कि वह अब नाना आकृतियों में अभिव्यक्त भी नहीं हो सकता! किन्तु हमारा सनातन वैदिक सिद्धान्त हरिहरैक्य है अर्थात् हरि ही हर हैं , हर ही हरि हैं - दोनों में कोई भेद नहीं ।
वेद में कहा गया -
चिन्मयस्याद्वितीयस्य निष्कलस्याशरीरिणः ।
उपासकानां कार्यार्थं ब्रह्मणो रूपकल्पना ।।
(श्रीरामपूर्वतापिन्युपनिषद् १।७)
श्रीमद्भागवत में ठीक यही कहा गया -
रूपं यत् तत् प्राहुरव्यक्तमाद्यं ब्रह्म ज्योतिर्निर्गुणं निर्विकारम् ।
सत्तामात्रं निर्विशेषं निरीहं स त्वं साक्षात् विष्णुरध्यात्मदीपः।।
( श्रीमद्भागवतम् १०।३।२४)
श्री आद्य शंकराचार्य का भी तो उक्त निगमानुरूप यही सर्वविदित सार सिद्धान्त है कि एक परमसत्य निर्विशेष निष्कल ब्रह्म ही अपनी माया शक्ति से निज भक्तों के लिये नाना रूपों में प्रकट होते हैं , फिर श्री आद्य शंकराचार्य का दुष्प्रचार किसलिये ?
श्रीकृष्ण ने कहाकि पाण्डवों का राज्य भले ना लौटाओ पर पॉच गॉव तो दे दो ! पर कलि -अवतार दुर्योधन की हठ थी कि पॉच गॉव तो क्या सुई की नोक जितनी भी भूमि भी नहीं दूंगा , वही हठ आजकल के नवीन वैष्णवों में है कि अन्य भगवदीय स्वरूपों को रत्ती भर भी ईश्वरत्व देने को तैयार नहीं होते! इन्हें तो बस अन्य ईश्वरीय स्वरूपों को ईश्वर का सैद्धान्तिक -सेवक ही बनाना है ! /// ईश्वर को स्वतन्त्र सिद्ध करने के लिये ईश्वर को कस के बॉध दो ! और ईश्वर को ही पहरेदारी पर बैठा दो ! // ये कुमतिमय छायी है इन कलिमलमूढ़ अज्ञानियों में !
अलमिति ।
एकं ब्रह्म परं सत्यं द्वितीयं नास्ति किञ्चन ।
हरि: शक्ति: शिवश्चेति ब्रह्मणो रूपकल्पना ।।
अनुमोदामहे सर्वं मतमास्तिक्यभूषितम् ।
न किञ्चित् प्रतिषेधाम: सर्वोsप्यात्मेति हेतुना ।।
।। जय श्री राम ।।
शिवाय नमः



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