BHASM MAHIMA | SHIV PURAN | SHIV PUJAN |
भस्म एवं त्रिपुण्ड्र धारण की महिमा
श्रीशिवपुराण, विद्येश्वरसंहिता, अध्याय 24
( भाग - प्रथम )
सितेन भस्मना कुर्यात्त्रिसन्ध्यं यस्त्रिपुण्ड्रकम् ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवेन सह मोदते ।।20।।
सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवेन सह मोदते ।।20।।
अर्थात् - जो मनुष्य तीनों संध्याकाल में अपनें मस्तक पर त्रिपुण्ड्र धारण करता हैं, वह समस्त पापों से मुक्त होकर शिवसान्निध्य का आनन्द भोगता है ।
सितेन भस्मना कुर्याल्ललाटे तु त्रिपुण्ड्रकम् ।
यो सावनादिभूतान्हि लोकानाप्तो मृतो भवेत् ।।21।।
अर्थात् - जो व्यक्ति श्वेत भस्म से अपने मस्तक पर त्रिपुण्ड्र धारण करता है वह अनादिभूत लोकों को प्राप्त कर अमर हो जाता हैं।
भस्मस्नानेन यावंतः कणाः स्वाण्गे प्रतिष्ठिताः ।
तावंति शिवलिंगानि तनौ धत्ते हि धारकः ।। 39 ।।
अर्थात्- भस्म स्नान करने से जितने कण शरीर में प्रवेश करते हैं, उतने ही शिवलिंगों को वह धारक अपने शरीर में धारण करता हैं ।
त्रिपुण्ड्रं ये विनिंदति निन्दन्ति शिवमेव ते ।
धारयंति च ये भक्त्या धारयन्ति तमेव ते ।। 44 ।।
अर्थात् - जो त्रिपुण्ड्र की निंदा (अथवा उपहास) करते है वह साक्षात् शिव की ही निन्दा करते हैं और जो त्रिपुण्ड्र धारण करते है, वे साक्षात् शिव को ही धारण करते हैं ।
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| प्रिय ओमनारायण |
सहस्रं पूर्वजातानां सहस्रं जनयिष्यताम् ।
स्ववंशजानां ज्ञातीनामुद्धद्यस्त्रिपुण्ड्रकृत् ।।66।।
अर्थात् – त्रिपुण्ड्र धारण करने वाला मनुष्य अपने वंश और गोत्र में उत्पन्न हजारों पूर्वजों का और भविष्य में उत्पन्न होने वाली हजारों सन्तानों का उद्धार करता है ।
इह भुक्त्वा खिलान्भोगान्दीर्घायुव्यार्धिवर्जितः ।
जीवितांते च मरणं सुखेनैव प्रपद्यते ।। 67 ।।
अष्टैश्वर्यगुणोपेतं प्राप्य दिव्यवपुः शिवम् ।
दिव्यं विमानमारुह्य दिव्यत्रिदशसेवितम् ।। 68 ।।
अर्थात् - जो त्रिपुण्ड्र धारण करता है, उसे इस लोक में रोगरहित दीर्घायु प्राप्त होती है और वह सम्पूर्ण भोगों का उपभोग करके जीवन के अन्तिम समय में सुखपूर्वक ही मृत्यु को प्राप्त होता है । वह मृत्यु के पश्चात् अणिमा, महिमा आदि आठों एश्वर्यों और सद्गुणों से युक्त दिव्य शरीरवाले शिव को प्राप्त होता है और दिव्य लोकों के देवों से सेवित दिव्य विमान पर चढ़कर शिवलोक को जाता हैं ।



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