भगवान् शिव और भगवान् नारायण में भेदबुद्धि का परिणाम - नरकवास
भगवान् शिव और भगवान् नारायण में भेदबुद्धि का परिणाम - नरकवास
रुद्रध्येयो भवांश्चैव भवद्ध्ययो हरस्तथा । युवयोरन्तरं नैव तव रुद्रस्य किंचन ।। (शि. पु. रु. सृ. खं. 10/6)
परमेश्वर शिव बोले - उत्तम व्रत का पालन करने वाले हरे! विष्णो! अब तुम मेरी दूसरी आज्ञा सुनो । उसका पालन करने से तुम सदा समस्त लोकों में माननीय और पूजनीय बने रहोगे । ब्रह्माजी के द्वारा रचे गये लोक में जब कोई दुःख या संकट उत्पन्न हो, तब तुम उन सम्पूर्ण दुःखों का नाश करने के लिये सदा तत्पर रहना । तुम्हारे सम्पूर्ण दुस्सह कार्यों में मैं तुम्हारी सहायता करूँगा । तुम्हारे जो दुर्जेय और अत्यन्त उत्कट शत्रु होंगे, उन सबको मैं मार गिराऊँगा । हरे! तुम नाना प्रकार के अवतार धारण करके लोक में अपनी उत्तम कीर्ति का विस्तार करो और सबके उद्धार के लिये तत्पर रहो । तुम रुद्र के ध्येय हो और रुद्र तुम्हारे ध्येय हैं । तुम में और रुद्र में कुछ भी अन्तर नहीं है।
रुद्रभक्तो नरो यस्तु तव निन्दां करिष्यति । तस्य पुण्यं च निखिलं द्रुतं भस्म भविष्यति ।।
नरके पतनं तस्य त्वद्द्वेषात्पुरुषोत्तम ष मदाज्ञया भवेद्विष्णो सत्यं सत्यं न संशयः ।। (शि. पु. रु. सृ. खं. 10/6)
जो मनुष्य रुद्र का भक्त होकर तुम्हारी (विष्णु की) निन्दा करेगा, उसका सारा पुण्य तत्काल भस्म हो जायगा । पुरुषोत्तम विष्णों! तुमसे द्वेष करने के कारण मेरी आज्ञा से उसको नरक में गिरना पड़ेगा । यह बात सत्य है, सत्य है । इसमें संशय नहीं हैं।
ब्रह्माजी कहते है - देवर्षे (नारदजी)! भगवान् शिव का यह वचन सुनकर मेरे साथ भगवान विष्णु ने सबको वश में करने वाले विश्वनाथ को प्रणाम करके मन्दस्वर में कहा -
श्रीविष्णु उवाच - मम भक्तश्च यः स्वामिंस्तव निन्दां करिष्यति । तस्य वै निरये वासं प्रयच्छ नियतं ध्रुवम् ।।
त्वद्भक्तो यो भवेत्स्वामिन्मम प्रियतरो हि सः । एवं वै यो विजानाति तस्य मुक्तिर्न दुर्लभा ।। (शि. पु. रु. सृ. खं. 10/6)
श्री विष्णु बोले - करुणासिन्धो! जगन्नाथ शंकर! मेरी यह बात सुनिये । मैं आपकी आज्ञा के अधीन रहकर यह सब कुछ (सृष्टि की रक्षा) करूँगा । स्वामिन्! जो मेरा भक्त होकर आपकी निन्दा करे, उसे आप निश्चय ही नरकवास प्रदान करें । नाथ! जो आपका भक्त है, वह मुझे अत्यन्त प्रिय है। जो ऐसा जानता है, उसके लिये मोक्ष दुर्लभ नहीं है ।
ब्रह्माजी कहते है - श्रीहरि का यह वचन सुनकर दुःखहारी हर ने उनकी बात का अनुमोदन किया और नाना प्रकार के धर्मों का उपदेश देकर हम दोनों के हित की इच्छा से हमें अनेक प्रकार के वर दिये । इसके बाद भक्तवत्सल भगवान् शम्भु कृपापूर्वक हमारी ओर देखते ही देखते सहसा वहीं अन्तर्धान हो गये ।
शिवाय नमः



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